कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 16 अक्तूबर 2019

हाथियों से मुठभेड़ - रोमाचक बाल कथा


रवि और मोहन दो दोस्त थे । वे फैंटम और शक्तिमान आदि की रामांचक चित्रकथाओं को देखना पसंद करते थे। धीरे-धीरे वे खुद कुछ रोमांचक कर गुजरने की सोचने लगे। वे जिस हॉस्टल में रहकर पढ़ते थे वह एक पहाड़ी पर स्थित था। उसके पास ही एक घाटी थी जिसमें हाथियों का झुुंड निवास करता था।
रवि और मोहन के मन में एक दिन आया कि किसी छुट्टी के दिन चुप-चाप हॉस्टल से निकल चला जाए और हाथियों को नजदीक से देखा जाए। एक दोपहर जब बाकी लडक़े सो रहे थे तब दोनों चैकीदार की आंख बचाकर एक जगह, जहां ऊंचे पत्थर रखे थे, उसके सहारे दीवार फांद गए। आवाज़ नहीं हो इसलिए उन्होंने अपने जूते-चप्पल उतार दिए थे पर जब वे दूसरी तरफ धूप में पड़ी चट्टानपर उतरे
तो उनके पैर झुलस गए। तेजी से भागकर वे पास के पेड़ के निकट गए। वहां खड़े होकर वे विचार करने लगे कि अब किधर चला जाए।
पर वहां चारों ओर कंटीली झाडिय़ां व ऊंची घास थी। रास्ता कहीं नजऱ नहीं आ रहा था। आखिर झाडिय़ों में राह बनाते जैसे-तैसे वे आगे बढऩे लगे। थोड़ी दूर चलने में ही रवि की कमीज़ में कई खरोंचें आ लगीं और मोहन का पांव एक पत्थर से लगकर घायल हो गया।
रास्ते में मोहन ने रवि से कहा - यार, लगता है हम बुरे फंस गए।
रवि क्या बोलता- सारी योजना उसी ने बनायी थी ।
तभी रवि को ख्याल आया कि क्यों न किसी पेड़ पर चढक़र देखा जाए शायद कहीं आस-पास कोई रास्ता हो। मोहन की टांग तो घायल थी। तब रवि ही पेड़ पर चढ़ा। जब ऊपर से उसने चारों ओर का दृश्य देखा तो खुशी से उछल पड़ा। उसने चिल्लाकर कहा - मोहन, यूरेका-यूरेका, पा लिया।
रवि ने डांटकर कहा, क्या बक रहे हो, रेका-रेका - कुछ देखा क्या ?
मोहन ने कहा- लगता है आर्कमेडीज का नाम भूल गए तुम, मैंने कहा- पा लिया, पा लिया, यूरेका-यूरेका। पास ही घाटी और नदी दिख रही है और एक रास्ता भी यहां से ऊपर उत्तर की तरफ जाता दिख रहा है।
रवि के नीचे आनेे के बाद मोहन उसके साथ एक बार फिर झाडिय़ों में रास्ता बनाने में भिड़ गया। ऊपर से जो रास्ता पास लग रहा था वह एक किलोमीटर से ज्यादा दूर था। वहां तक जाने में दोनों की बुरी गत हो गई । कपड़े चिथड़ों में बदल गए। पर दोनों को खुशी हुई कि अब वे घाटी के रास्ते पर आ गए हैं।
पर वे बुरी तरह थक गए थे। सो वे वहीं पेड़ के नीचे लेट गये और उन्हें नींद आ गई। वे काफी देर तक सोते रहे। शोर-गुल सुनकर जब उनकी नींद टूटी तो अंधेरा घिरने को था। जिस पेड़ के नीचे वे सोए थे उस पर कहीं से बंदरों का झुंड आ गया था । बंदर चीख-चीखकर इधर से उधर कूद-फांद रहे थे ।
रवि ने मोहन से पूछा, बंदर इतनी चीख-पुकार क्यों मचा रहे हैं ? मोहन ने सोचते हुए कहा- आस-पास किसी हिंसक जानवर के होने पर ही वे ऐसा करते हैं ।
पर जहां तक हमने लोगों से सुना है इन घाटियों में कोई हिंसक जानवर तो रहता नहीं । तभी रवि ने कुछ देखा और चीख पड़ा। मोहन चलो भागें। और उसने मोहन को करीब खींचते हुए पेड़ के पास के पत्थर से नीचे छलांग लगा दी, जिस पर वे सो रहे थे। और जब वे संभल कर खड़े हुए तो एक अजग़र धप्प से उस पेड़ से नीचे गिरा ।
यह दृश्य देख दोनों कांप कर रह गए। अंधेरा घिर रहा था और दोनों घबड़ाने लगे थे। रवि एक बार फिर पास के पेड़ पर चढ़ा । ऊपर से उसने जो देखा तो उसकी रूह कांप गई। सामने एक किलोमीटर की दूरी पर बह रही नदी से निकलकर हाथियों का झुंड उसी रास्ते की ओर बढ़ा आ रहा था ।
रवि जल्दी से पेड़ से नीचे आया और मोहन के साथ मिलकर वह आस -पास किसी मज़बूत पेड़ की तलाश करने लगा। रवि जानता था कि हाथी की घ्राण क्षमता बहुत तेज होती है और आस-पास आदमी की गंध पाते ही वे उन्हे ढूंढना शुरू कर देंगे। ऐसे में अगर उन्होंने कोई सुरक्षित जगह नहीं तलाशी तो अंधेरा पूरी तरह घिर जाने पर जान सांसत में पड़ जाएगी ।
तभी थोड़ी दूर पर उन्हें तीन पेड़ों के झुरमुट में एक मचान बंधी दिखी। वे जब पास गए तो उन पेड़ों पर दस फीट की ऊंचाई पर दोमुही कीलें गड़ी थीं। रवि ने मोहन को बताया- कि लगता है यह मचान शिकारियों ने बनायी है। सुरक्षा के लिए लिहाज से यहां रात बितायी जा सकती है। दोनों झटपट उस पेड़ पर चढ़ गए। मचान पर जाकर दोनों ने जब चारों ओर का दृश्य देखा तो खुशी से उछल पड़े। उन पेड़ों से थोड़ी ही दूर आगे एक ओर खुला मैदान था। वहां कांसे की थाली सा चांद धीरे-धीरे चढ़ रहा था। वे चांद को निहार ही रहे थे कि उन्हें धपर-धपर की तेज़ भारी आवाज़ नजदीक आती सुनाई दी। वे समझ गए कि हाथियों का झुंड अब करीब आ गया है।
देखते-देखते हाथी करीब आ गये। सबसे आगे कुछ बड़े हाथी थे, फिर कुछ हथनियां थीं और बीच-बीच में उनसे घिरे बच्चे चल रहे थे। झुंड धीरे-धीरे रास्ते पर बढ़ा जा रहा था, दुलकता हुआ। रवि और मोहन को लगा कि खतरा टल गया। पर इसी समय झुंड में सबसे आगे चल रहा हाथी रूक गया और जोर से चिग्घाड़ा। फिर तो सभी हाथी रुक गए ।
अब अगुआ हाथी ने रवि-मोहन के पेड़ की ओर रुख किया और बाकी हाथी भी उसके पीछे चल दिए । फिर तो उनकी घमा-चैकड़ी से उठी धूल ने फैल रहे अंधेरे को और घना कर दिया  ।
ऊपर मचान पर बैठै रवि -मोहन को पता नहीं चल रहा था कि अब क्या करें? हाथी तेजी से दौड़ते पेड़ तक आए, फिर रूक गए। पहले उन्होंने सूढ़ से टटोल कर पेड़ को पकड़  में  लेना चाहा, पर शिकारियों द्वारा चुना गया पेड़ चौड़ा था। फिर उस पर लगी कीलों के चलते हाथी उसे धक्का भी नहीं मार पा रहे थे। आखिर वे वहीं पेड़ को घेर कर बैठ गए ।
रवि मोहन की सांस रूक सी गयी थी। अब जाकर उन्हें थोड़ी सी राहत मिली । वे सोचने लगे कि पता नहीं हाथी कब-तक पेड़ को घेरे बैठै रहेंगे। धीरे-धीरे चांदनी फैलती जा रही थी और ऊपर बैठे दोनों को हाथियों का क्रिया-कलाप मजेदार लगने लगा था। क्रोध में उन्मत्त हाथी आस-पास के पेड़ों में टक्कर मारते चल रहे थे।
रवि और मोहन का भय अब समाप्त हो चुका था । अब वे इस दृश्य का मजा ले रहे थे। कुछ देर धमा-चैकड़ी मचाकर हाथी अपने घर की ओर चल दिए। रवि-मोहन को भूख लग आई थी पर वहां खाने को क्या था? फिर दोनों को नींद आ गई।
सुबह चिडिय़ों के कलरव से जब उनकी नींद टूटी तो सूरज सामने आ चुका था । जल्दी-जल्दी वे मचान से नीचे आए और झाडिय़ों से बचते हॉस्टल की ओर चले । हॉस्टल पहुंचने तक आठ बज चुके थे और वहां दोनों की खोज-बीन आरंभ हो चुकी थी। दोनों ने हॉस्टल इंचार्ज से बिना पूछे जाने के लिए माफी मांगी जिसके लिए उन्हें काफी डांट पड़ी और माता-पिता से शिकायत की चेतावनी भी दी गयी। वहां से छूटने पर उन्होंने अपनी रामकहानी बाकी बच्चों को सुनाई। कहानी सुनकर बच्चों की आंखें विस्मय से फैलती चली गईं ।

  

1 टिप्पणी:

Rakesh Kaushik ने कहा…

कहानी और प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा लगा